प्रतिनियुक्ति पर बने रहना कानूनी अधिकार नहीं, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि किसी भी शासकीय सेवक को प्रतिनियुक्ति पर लगातार कार्य करते रहने का विधिक अधिकार प्राप्त नहीं है। सक्षम प्राधिकारी जब चाहे तब प्रतिनियुक्ति समाप्त कर संबंधित कार्मिक को उसके मूल विभाग में वापस भेजने का पूर्ण अधिकार रखता है। न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने इस कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए पदस्थापना आदेश के विरुद्ध दायर याचिका निरस्त कर दी है।
प्रकरण के विवरण के अनुसार याचिकाकर्ता प्रीति तिवारी ई-संवर्ग में प्राचार्य के रूप में पदस्थ हैं। वे बिलासपुर स्थित उन्नत शिक्षण अध्ययन संस्थान में सहायक प्राध्यापक के पद पर प्रतिनियुक्ति पर अपनी सेवाएँ दे रही थीं। राज्य शासन ने 10 जुलाई 2026 को एक आदेश पारित कर उनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त कर दी। इसके साथ ही शासन ने उन्हें बलौदाबाजार-भाटापारा ज़िले के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बल्दाकछार स्थित मूल पद पर कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए थे।
शासन के इस कदम के खिलाफ याचिकाकर्ता ने वरिष्ठ सचिवों की शिकायत निवारण समिति के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था। समिति ने पूरे मामले का परीक्षण करने के उपरांत 19 अगस्त को इस आवेदन को खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर प्रशासनिक निर्णय को चुनौती दी।
याचिका में दावा किया गया था कि संस्थान के कुछ कर्मियों सहित उनके विरुद्ध मिली एक शिकायत के आधार पर यह कार्रवाई की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि सेवा समाप्ति की सिफारिश तत्कालीन प्राचार्य के नाम पर जारी एक कथित पत्र से भेजी गई थी। याचिका के अनुसार तत्कालीन प्राचार्य ने ऐसा कोई पत्र तैयार करने अथवा उस पर हस्ताक्षर करने की बात से पूरी तरह इनकार किया था। इसके साथ ही पत्र में फर्जी तरीके से दस्तखत और संस्था की शासकीय मुहर के अनधिकृत उपयोग की बात भी कही गई थी।
न्यायालय ने सेवा नियमों का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ किसी भी कर्मचारी का यह कानूनी हक नहीं बनता कि वह दूसरे विभाग में निरंतर बना रहे। सक्षम प्राधिकारी अपनी प्रशासनिक आवश्यकतानुसार कर्मचारी को उसके मूल विभाग में प्रत्यावर्तित करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र और अधिकृत है।