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विवाहित बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की पात्र, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने निरस्त किया शासन का आदेश

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Vinoth offl / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अनुकंपा नियुक्ति के एक प्रकरण में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। न्यायालय के अनुसार अविवाहित सरकारी सेवक की मृत्यु के उपरांत उसकी विवाहित बहन भी आश्रित कोटे में पद पाने की पूर्ण हकदार है। पीठ ने स्पष्ट किया कि विवाह के पश्चात किसी पुत्री अथवा बहन का अपने पैतृक परिवार से संबंध समाप्त नहीं होता। वैवाहिक स्थिति अथवा लैंगिक आधार पर किसी नागरिक को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखना विधिसम्मत नहीं है।

न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने इस मामले में राज्य शासन के गृह एवं सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा उन्नीस सितंबर दो हज़ार उन्नीस को जारी आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने संबंधित महिला को चार सप्ताह की समय-सीमा के भीतर अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करने का निर्देश शासन को दिया है।

यह प्रकरण बिलासपुर के नेहरू नगर निवासी स्वर्गीय दुर्गेश मिश्रा से संबंधित है। वह जांजगीर-चांपा जिले में जिला लोक अभियोजन अधिकारी के पद पर पदस्थ थे। तेरह जून दो हज़ार अठारह को शासकीय सेवा के दौरान उनका आकस्मिक निधन हो गया था। दिवंगत अधिकारी अविवाहित थे। उनके देहावसान के पश्चात उनकी वृद्ध माता तारा मिश्रा ने वर्ष दो हज़ार तेरह की राज्य अनुकंपा नीति के तहत अपनी पुत्री अमिता दुबे के लिए नियुक्ति हेतु आवेदन प्रस्तुत किया था।

राज्य शासन के संबंधित विभाग ने इस आवेदन को यह तर्क देकर अस्वीकार कर दिया था कि नियमों में विवाहित बहन को अनुकंपा पद देने का कोई प्रत्यक्ष प्रावधान नहीं है। इस प्रशासनिक निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तथा सायरा खातून बनाम बिहार राज्य के फैसलों की नजीर प्रस्तुत की गई। न्यायालय के समक्ष दलील दी गई कि जब अविवाहित शासकीय कर्मी के निधन पर माता-पिता की अनुशंसा से विवाहित भाई को अवसर दिया जा सकता है, तब विवाहित बहन के साथ ऐसा विभेद संविधान के अनुच्छेद चौदह व पंद्रह (एक) का सीधा उल्लंघन है।

उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य कमाऊ सदस्य के असामयिक निधन से प्रभावित परिवार को त्वरित वित्तीय सुरक्षा उपलब्ध कराना है। इसका मुख्य आधार आर्थिक निर्भरता है, न कि वैवाहिक स्थिति। पीठ ने यह भी कहा कि वर्तमान समाज में विवाहित बेटियां और बहनें भी परिवार का संबल बनती हैं, इसलिए पुरानी रूढ़िवादी धारणाओं को संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के विपरीत स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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