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छत्तीसगढ़: इंडस्ट्रियल पार्क परियोजना में बजट रुकने से मशीनें निष्क्रिय, अधोसंरचना अधूरी

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Mettle30 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

छत्तीसगढ़ में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार संवर्धन के लिए शुरू किए गए महात्मा गांधी इंडस्ट्रियल पार्कों का कामकाज वित्तीय आवंटन बाधित होने से प्रभावित हुआ है। कोरबा जिले के वार्ड क्रमांक 14 पंप हाउस क्षेत्र में स्थापित महात्मा गांधी अर्बन इंडस्ट्रियल पार्क में स्थापित मशीनें जंग खा रही हैं और अधोसंरचनात्मक निर्माण अधूरे पड़े हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक, विकास कार्यों के लिए शासन स्तर से अगली किस्त न मिलने के कारण परिसर में उत्पादन गतिविधियां ठप हैं।

पूर्ववर्ती भूपेश बघेल सरकार ने 2 अक्टूबर 2022 को महात्मा गांधी रूरल इंडस्ट्रियल पार्क योजना की शुरुआत की थी। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के नोडल नियंत्रण में प्रथम चरण के तहत राज्यभर के विकासखंडों में 300 ग्रामीण पार्क स्थापित करने का लक्ष्य तय किया गया था। इस कार्ययोजना के लिए राज्य बजट में 600 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान रखा गया था। इसके तहत प्रत्येक विकासखंड के दो गौठानों में एक से तीन एकड़ भूमि आरक्षित कर शेड, पहुंच मार्ग, बिजली, पानी और युवाओं के प्रशिक्षण के लिए प्रति पार्क एक करोड़ रुपये की राशि दी गई थी।

ग्रामीण परिसरों में वर्मी कंपोस्ट, कुक्कुट पालन, बकरी पालन, कृषि और वनोपज प्रसंस्करण के साथ दाल, तेल व आटा मिल जैसी सूक्ष्म इकाइयां लगाने की रूपरेखा बनाई गई थी। इसी तर्ज पर शहरी निकायों में अर्बन इंडस्ट्रियल पार्क विकसित करने का निर्णय लिया गया, ताकि भूमि या पूंजी के अभाव से जूझ रहे छोटे उद्यमियों, बेरोजगारों और महिला स्व-सहायता समूहों को आजीविका मिल सके। कोरबा के पंप हाउस स्थित पार्क के लिए लगभग दो करोड़ रुपये का शुरुआती बजट तय हुआ था। यहां तत्कालीन आयुक्त प्रभाकर पांडे के कार्यकाल में शेड, चारदीवारी और सड़क जैसे बुनियादी ढांचे का काम शुरू किया गया था।

इस अर्बन पार्क में गोबर पेंट, प्लास्टिक रीसायकल ग्रेन, टायर री-ट्रेडिंग, ऑटोमोबाइल सूक्ष्म उद्यम, अगरबत्ती, नमकीन, पैकेज ड्रिंकिंग वॉटर और नारियल के रेशे से रस्सी निर्माण जैसी इकाइयां प्रस्तावित थीं। राज्य में शासन बदलने के बाद आगे का फंड जारी नहीं हुआ। इसके चलते कोरबा समेत विभिन्न स्थानों पर गोबर पेंट का स्टॉक डंप पड़ा है और मशीनें कबाड़ में बदल रही हैं। वर्तमान साय सरकार द्वारा इस परियोजना के संचालन अथवा वैकल्पिक उपयोग को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं किए जाने से करोड़ों रुपये का सरकारी निवेश अधर में है।

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