छत्तीसगढ़ में ग्रामीण और शहरी इंडस्ट्रियल पार्क: योजना के प्रावधान और मैदानी स्थिति

छत्तीसगढ़ में पूर्ववर्ती सरकार ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार के नए साधन विकसित करने के लिए महात्मा गांधी रूरल इंडस्ट्रियल पार्क योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत प्रत्येक विकासखंड के गौठानों को आजीविका केंद्र के रूप में चिन्हित किया गया था। इस योजना के संचालन का दायित्व पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को सौंपा गया था। आधिकारिक विवरण के अनुसार, प्रथम चरण में 300 औद्योगिक पार्क स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिए राज्य स्तर पर 600 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान तय हुआ था।
शासकीय प्रावधानों के तहत प्रत्येक चयनित केंद्र के लिए एक से तीन एकड़ भूमि आरक्षित की गई थी। योजना के तहत स्वीकृत प्रत्येक पार्क को कार्यशील शेड, पहुंच मार्ग, पेयजल और विद्युत व्यवस्था के साथ-साथ युवाओं के प्रशिक्षण हेतु एक-एक करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का नियम बनाया गया था। बालोद जिले में पहले चरण के दौरान पांचों विकासखंडों से दो-दो गौठानों का चयन कर कुल 20 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की योजना बनी थी। इनमें बरही, हथौद, अरमुरकसा, अवारी, मार्रीबंगला, नंगुटोला, गब्दी, कांदूल, भोथली और छेड़िया जैसे गांवों को शामिल किया गया था।
इन परिसरों में स्व-सहायता समूहों की महिलाओं और युवाओं द्वारा खाद्य तेल, आटा चक्की, दाल मिल, वर्मी कंपोस्ट, मुर्गी पालन, बकरी पालन तथा लघु वनोपज प्रसंस्करण इकाइयां संचालित करने का खाका खींचा गया था। इसी तर्ज पर शहरी क्षेत्रों के लिए अर्बन इंडस्ट्रियल पार्क की परिकल्पना भी की गई थी, ताकि पूंजी अथवा भूमि के अभाव से जूझ रहे छोटे उद्यमियों को विनिर्माण गतिविधियों से जोड़ा जा सके।
मैदानी स्तर पर सत्ता परिवर्तन के उपरांत इन परियोजनाओं की निरंतरता प्रभावित हुई है। कोरबा नगर के वार्ड क्रमांक 14 स्थित पंप हाउस अर्बन इंडस्ट्रियल पार्क में बाउंड्री वॉल, शेड और सड़क जैसे कार्य अधूरे रह गए हैं। स्थानीय प्रतिनिधियों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आगामी विकास कार्यों के लिए शासन स्तर से फंड जारी न होने के कारण वहां स्थापित मशीनें उपयोग के अभाव में जंग खा रही हैं। इसी तरह प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में गोबर पेंट की इकाइयां और अन्य उत्पादन संयंत्र वित्तीय आवंटन रुकने से बंद पड़े हैं, जिससे परिसंपत्तियों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।