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छत्तीसगढ़ में भूमि सौदों के लिए वन भूमि सत्यापन अहम, रिकॉर्ड के मिलान से तय होगी विधिक स्थिति

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Harminder Singh Saini / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

छत्तीसगढ़ में अचल संपत्ति के सौदों और भूमि पंजीकरण के दौरान वन विभाग का अनापत्ति प्रमाणीकरण एक जरूरी प्रक्रिया माना जा रहा है। देश में तीसरा सबसे बड़ा वन आच्छादन वाला राज्य होने के कारण यहां अनेक इलाकों में राजस्व और वन भूमि की सीमाएं एक-दूसरे पर आच्छादित पाई जाती हैं। बस्तर, कांकेर और सरगुजा संभाग में कई बंदोबस्त रिकॉर्ड आधुनिक जीआईएस तकनीकी मानचित्रण से पहले के हैं। इस वजह से कई बार कृषि पट्टे के रूप में बेची जाने वाली जमीन भी अधिसूचित वन क्षेत्र की सीमाओं के भीतर दर्ज मिलती है।

प्रभागीय वन अधिकारी यानी डीएफओ द्वारा जारी किया जाने वाला यह सत्यापन दस्तावेज प्रमाणित करता है कि अमुक खसरा या सर्वे नंबर भारतीय वन अधिनियम 1927 और वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत विभागीय अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आता है। जानकारों के मुताबिक, दोनों विभागों के आंकड़े अलग-अलग प्रणाली पर आधारित हैं। राजस्व विभाग के अभिलेखों में खसरा बी-1 अथवा भू-नक्शा स्पष्ट दिखाई देने के बावजूद संबंधित पार्सल वन संरक्षण अधिनियम 1980 के दायरे में हो सकता है।

विभागीय जांच पड़ताल न कराने की स्थिति में कई खरीदारों को पंजीकरण के वर्षों बाद ढांचा गिराए जाने के आदेश या प्राथमिकी जैसी विधिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है। सत्यापन प्रक्रिया के दौरान जमीन के सर्वे नंबर का मिलान बिक्री विलेख से किया जाता है। इसके साथ ही गांव, तहसील और जिले के अधिकार क्षेत्र की जांच राजस्व रिकॉर्ड से की जाती है। प्रपत्र में वन श्रेणी की स्थिति के तहत आरक्षित, संरक्षित अथवा सामुदायिक की जगह स्पष्ट प्रविष्टि होना अनिवार्य होता है।

संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुसार, यह प्रमाणपत्र डीएफओ के आधिकारिक नाम और मुहर के साथ जारी होना चाहिए तथा इसकी वैधता अवधि की दृष्टि से नब्बे दिन से अधिक पुराना दस्तावेज स्वीकार्य नहीं माना जाता है। बस्तर संभाग जैसे क्षेत्रों में ऑनलाइन रिकॉर्ड के अलावा जमीनी स्तर पर कार्यालयीन पड़ताल भी आवश्यक समझी जाती है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के कानूनी विवाद से बचा जा सके।

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