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छत्तीसगढ़ में यूसीसी का मसौदा तैयार, देसाई समिति 30 नवंबर तक सरकार को सौंपेगी अपनी रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता की रूपरेखा तय करने हेतु गठित विशेषज्ञ समिति 30 नवंबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट शासन को सौंपेगी। इसके बाद दिसंबर माह में आयोजित होने वाले विधानसभा के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान इस विधेयक को पटल पर पेश किए जाने की योजना है। सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला पाँच सदस्यीय पैनल अब प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर दस्तावेज़ को अंतिम रूप देने में जुटा है।

राज्य शासन ने जून 2026 में इस संहिता के निर्माण के लिए समिति का गठन किया था। इसके पश्चात समिति ने रायपुर, दुर्ग, अंबिकापुर, सूरजपुर सहित बस्तर संभाग के तीन ज़िलों में पहुँचकर स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों और विभिन्न धार्मिक संस्थाओं के साथ संवाद बैठकें आयोजित की थीं। आम लोगों से डाक, पोर्टल, ई-मेल और प्रत्यक्ष माध्यमों द्वारा आपत्तियाँ एवं सुझाव मँगवाए गए थे। ऑनलाइन सुझाव प्रेषित करने की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर को समाप्त हो चुकी है, जिसके तहत समिति के पास 1,000 से अधिक प्रतिवेदन पहुँचे हैं।

प्राप्त सुझावों के अध्ययन के आधार पर तैयार हो रहे मसौदे में लिव-इन संबंधों को लेकर कड़े प्रावधान प्रस्तावित हैं। इसके तहत लिव-इन में साथ रहने और आपसी सहमति अथवा विवाद से अलग होने, दोनों ही स्थितियों का सरकारी रजिस्ट्रार के समक्ष औपचारिक पंजीकरण अनिवार्य किया जा सकता है। रिश्ता समाप्त करने की दशा में रजिस्ट्रार कार्यालय में विधिवत सूचना दर्ज करानी होगी, जिसकी एक प्रति दूसरे साथी को प्रेषित की जाएगी। इन दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने वालों के लिए अर्थदंड और कारावास की सज़ा भी विचाराधीन है। इसके अतिरिक्त संबंध विच्छेद के बाद महिला साथी को भरण-पोषण दिलाने हेतु न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन की सुविधा तथा ऐसे रिश्तों से जन्मी संतानों को वैध मानकर पिता की पैतृक संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी देने का प्रस्ताव भी शामिल किया जा रहा है।

ड्राफ्ट में सभी नागरिकों के लिए विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने तथा तलाक के एकसमान नियम लागू करने की भी तैयारी चल रही है। इसके साथ ही समिति को भरण-पोषण, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे मामलों पर भी विविध समुदायों की राय मिली है। बस्तर एवं सरगुजा अंचल के जनजातीय समाज द्वारा अपनी पारंपरिक रूढ़ियों और सांस्कृतिक पहचान को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई थीं। इसे ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञ समिति आदिवासी समुदाय की विशिष्ट रीति-रिवाजों के संरक्षण को मसौदे में प्राथमिकता देने पर कार्य कर रही है।

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