बालोद में बेमौसम वर्षा और ओलावृष्टि से धान सहित मौसमी फसलें प्रभावित

बालोद ज़िले के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में असमय हुई वर्षा और ओलावृष्टि के चलते खेतों में पककर तैयार धान और अन्य फसलों को भारी क्षति पहुँची है। दो दिनों तक बने रहे प्रतिकूल मौसम के कारण तापमान में तो कमी आई, किंतु कटाई की कगार पर खड़ी फसलों पर इसका विपरीत असर पड़ा है। शाम के समय चली तेज़ हवाओं और झमाझम बौछारों ने पौधों को ज़मीन पर गिरा दिया, जिससे धान की बालियाँ टूटकर खेतों में ही बिखर गईं।
ज़िले के अलग-अलग विकासखंडों में रुक-रुक कर हुई खंड वर्षा से नुकसान का दायरा भिन्न-भिन्न हिस्सों में फैल गया है। खेतों में धान के अलावा गेहूँ और हरी सब्जियों की पैदावार को भी गहरा आघात लगा है। अधिकांश उत्पादक आगामी कुछ दिनों में अपनी कटी हुई फसल समेटने की तैयारी में थे, जबकि कुछ खेतों में दाने पकने का इंतज़ार चल रहा था। मौसम के इस अचानक आए बदलाव ने किसानों के परिश्रम पर पानी फेरते हुए कटाई के कार्य को अधर में लटका दिया है।
स्थानीय कृषक नोहर मंडावी के अनुसार, उन्होंने अपने पाँच एकड़ के रकबे में धान बोया था, जिसमें से तीन एकड़ क्षेत्र की उपज पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। उन्होंने बताया कि इस बार फसल का बीमा नहीं कराया जा सका था, जिसके कारण अब नुकसान की भरपाई की कोई तात्कालिक उम्मीद नहीं दिख रही है। क्षेत्र के अन्य काश्तकार भी खेतों में लगी मक्का और टमाटर की फसलों की तुड़ाई तथा कटाई को लेकर भारी संशय और चिंता में घिरे हैं।
इस प्राकृतिक आपदा से पहले ज़िला मुख्यालय से सटे कुछ ग्रामीण अंचलों में भीषण गर्मी तथा सिंचाई के लिए पानी की कमी के चलते फसलें सूखने की नौबत आई थी। उस समय कई काश्तकारों ने विवश होकर अपनी अधपकी फसल को मवेशियों के हवाले कर दिया था। अब जब बची हुई फसलें पकने की अंतिम अवस्था तक पहुँची थीं, तब असमय आई ओलावृष्टि ने रही-सही उम्मीदों को भी तोड़ दिया है। पड़ोसी ज़िले महासमुंद में भी इसी मौसमी मार से धान उत्पादकों को गहरा नुकसान पहुँचा है, जिसके बाद प्रभावित काश्तकार संकट से उबरने की राह देख रहे हैं।