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मध्यप्रदेश में वन्यजीव अपराध की जांच: कूनो से संरक्षण संस्था वाइल्डलाइफ एसओएस तक जुड़े तार

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Yawansahu / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

आगरा में दस तेंदुओं की खाल मिलने के बाद शुरू हुई पड़ताल मध्यप्रदेश के चीता क्षेत्र और चंबल के वनों से होते हुए दिल्ली स्थित संरक्षण संगठन वाइल्डलाइफ एसओएस तक पहुंच गई है। इस पूरे प्रकरण में पकड़े गए आरोपी भगवान सिंह को ‘सलीम’ नाम की दूसरी पहचान दिए जाने का मामला सामने आया है। वन विभाग के सूत्रों का दावा है कि संस्था से जुड़े व्यक्तियों ने भगवान सिंह को यह वैकल्पिक पहचान दी थी, ताकि आवश्यकता पड़ने पर प्रकरण को सांप्रदायिक रंग दिया जा सके। जांच दल अब यह पड़ताल कर रहे हैं कि यह नाम किन परिस्थितियों में और किसके द्वारा उपयोग में लाया गया।

जांच के दौरान श्योपुर और मुरैना के जंगलों से भारी मात्रा में प्रतिबंधित लोहे के फंदे जब्त किए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार ये फंदे कथित तौर पर हरियाणा से मध्यप्रदेश भेजे गए थे। मामले में कई आरोपियों को पकड़ा गया है और तकनीकी साक्ष्यों के जरिए पूरे नेटवर्क का पता लगाया जा रहा है।

मध्यप्रदेश की प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं मुख्य वन्यजीव अभिरक्षक डॉ. समीता राजौरा के अनुसार, हिरासत में लिए गए आरोपियों से मिली सूचना और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जांच दल वाइल्डलाइफ एसओएस के संपर्कों तक पहुंचे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पकड़े गए आरोपियों के संबंध इस संस्था से पाए गए हैं, जिसकी विस्तृत पड़ताल की जा रही है। पूछताछ के दौरान दो आरोपियों ने संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण का नाम लिया, जिसके बाद उन्हें बयान दर्ज कराने के लिए तलब किया गया।

वाइल्डलाइफ एसओएस के दावों के अनुसार, यह संस्था पिछले बत्तीस वर्षों से अधिक समय से देश के उन्नीस राज्यों में वन्यजीवों के बचाव, पुनर्वास और संरक्षण का कार्य कर रही है। संस्था का कहना है कि उसने विभिन्न वन विभागों के साथ मिलकर अब तक 5.31 लाख से अधिक वन्यजीवों की रक्षा में सहायता की है। संस्था शिकार-रोधी खुफिया जानकारी जुटाने का काम भी करती रही है। फिलहाल जांच एजेंसियां आरोपियों और संस्था के पदाधिकारियों के बीच संबंधों की वास्तविक प्रकृति तथा तस्करी नेटवर्क में उनकी संभावित संलिप्तता की पुष्टि करने में जुटी हैं।

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