कोरबा में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत धान के स्थान पर मूंगफली की बुआई को बढ़ावा

छत्तीसगढ़ में फसल विविधीकरण को रफ्तार देने के मकसद से शासन स्तर पर तिलहन और दलहन उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कोरबा ज़िले में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत किसानों को पारंपरिक धान के बदले मूंगफली जैसी कम जल खपत वाली नकदी फसलों से जोड़ा जा रहा है। ज़िले में इस योजना को ज़िला खनिज संस्थान न्यास यानी डीएमएफ से भी संबद्ध किया गया है, जिसके माध्यम से किसानों को निःशुल्क बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
कोरबा के दादर गांव निवासी कृषक नंदकुमार पहले पारंपरिक धान की खेती करते थे, जिसमें कम मुनाफ़ा होने के साथ कई बार नुकसान उठाना पड़ता था। कृषि विभाग से निःशुल्क बीज मिलने के बाद उन्होंने अपने खेत में मूंगफली की बुआई शुरू की। कम लागत और सीमित देखरेख में तैयार होने वाली इस फसल से उन्हें संतोषजनक पैदावार मिल रही है।
मूंगफली की बुआई के लिए अच्छी जल निकासी वाली हल्की, रेतीली अथवा दोमट मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। यह फसल 120 से 150 दिनों के भीतर पककर तैयार हो जाती है। खरीफ और रबी सीजन के मध्य अथवा ग्रीष्मकाल में इसकी खेती से प्रति एकड़ लगभग 15 से 20 क्विंटल तक उपज प्राप्त हो सकती है। बाज़ार में मूंगफली की दर 6000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाती है, जो कि 3100 रुपये प्रति क्विंटल के धान समर्थन मूल्य की तुलना में कहीं अधिक है।
मूंगफली मक्का जैसी फसलों से अधिक लाभप्रद नकदी फसल साबित होती है। इसके दाने, तेल और खली का उपयोग खाद्य तथा औद्योगिक क्षेत्रों में व्यापक रूप से होता है। इसके अतिरिक्त, यह तिलहनी फसल भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण के जरिए खेतों की उर्वरा शक्ति में भी इजाफ़ा करती है। केंद्र व राज्य शासन की इस पहल का प्रमुख ध्येय अधिक पानी की खपत वाले धान का रकबा घटाकर किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर प्रेरित करना है।