छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का फैसला: लापता कर्मी की पत्नी को मिलेंगे समस्त सेवा परिलाभ

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि सात वर्ष से अधिक समय से लापता कर्मचारी की पत्नी अपने पति की बर्खास्तगी को चुनौती दे सकती है और समस्त सेवा लाभ पाने की हकदार है। न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल की पीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) बिलासपुर के पूर्व फैसले को बरकरार रखा। इसके साथ ही स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) की रिट याचिका निरस्त कर दी गई।
मामले के तथ्यों के अनुसार, भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) के अधीन राजहरा खदान में कार्यरत एक वरिष्ठ तकनीशियन 14 जनवरी 2010 से अचानक लापता हो गया था। कर्मचारी की पत्नी ने इस बाबत प्राथमिकी दर्ज कराई थी। कर्मी के लापता होने की आधिकारिक सूचना मिलने के बाद भी संयंत्र प्रबंधन ने 11 दिसंबर 2010 को आरोप पत्र जारी किया। इसके पश्चात अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 17 सितंबर 2011 को एकतरफा कार्रवाई कर कर्मचारी को सेवा से निष्कासित कर दिया था।
इस निष्कासन के खिलाफ कर्मी की पत्नी ने कैट में अर्जी लगाई थी। न्यायाधिकरण ने सेवा समाप्ति का आदेश निरस्त करते हुए समस्त परिणामी परिलाभ देने का निर्देश जारी किया था। प्रबंधन ने इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती देकर दलील दी कि सक्षम दीवानी अदालत से मृत्यु की औपचारिक घोषणा प्राप्त किए बिना पत्नी को ऐसी याचिका लगाने का विधिक अधिकार नहीं है।
उच्च न्यायालय ने सेल प्रबंधन के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी व्यक्ति की सात वर्ष से अधिक समय तक कोई जानकारी न मिले, तब भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 108 के तहत विधिक रूप से मृत्यु का अनुमान लागू हो जाता है। इसके लिए विशिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 के तहत सिविल कोर्ट के पृथक आदेश की कोई विधिक आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने भारत सरकार के 28 अप्रैल 2022 के कार्यालय ज्ञापन का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत लापता कर्मियों के आश्रित पारिवारिक पेंशन, ग्रेच्युटी, बकाया वेतन और अर्जित अवकाश नकदीकरण के हकदार हैं। पीठ ने बीएसपी की कार्रवाई को विधिक रूप से गलत ठहराते हुए प्रबंधन को महिला के सभी देयकों का त्वरित निपटारा करने का आदेश दिया।