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छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता: सरकारी दर, गबन के आरोप और संग्राहकों का खुले बाज़ार की ओर रुझान

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Anil Sharma / Pexels

छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता संग्रहण का मौसम वनाश्रित परिवारों के लिए आय का एक अहम स्रोत बना हुआ है। राज्य सरकार ने तेंदूपत्ते के एक मानक बोरे की दर चार हजार रुपये तय की है। iforest.global द्वारा जारी तथ्यपत्र के अनुसार, वर्ष २०२२ में प्रत्येक संग्राहक को मजदूरी के रूप में औसतन पाँच हजार एक सौ रुपये मिले। इसके अतिरिक्त संग्राहकों को बोनस भी मिलता है, हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि उक्त औसत राशि में बोनस शामिल था या नहीं।

छत्तीसगढ़ लघु वनोपज संघ की कल्याण योजनाओं के अनुसार, तेंदूपत्ता व्यापार से होने वाले लाभ का सत्तर प्रतिशत संग्राहकों को प्रोत्साहन मजदूरी के रूप में दिया जाता है, पंद्रह प्रतिशत ग्राम संसाधन विकास के लिए और शेष पंद्रह प्रतिशत अन्य विकास कार्यों हेतु आवंटित होता है। यह ढाँचा कागज़ पर संग्राहकों के हित में दिखता है, किंतु जमीनी स्थिति इससे अलग संकेत देती है।

नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत ने आरोप लगाया है कि आदिवासी संग्राहकों के बोनस भुगतान में आठ करोड़ बीस लाख रुपये का गबन हुआ। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के अनुसार, महंत का कहना है कि यह राशि संग्राहकों तक पहुँचने की बजाय हड़प ली गई।

सरकारी दर को अपर्याप्त मानने वाले संग्राहकों का एक वर्ग खुले बाज़ार में तेंदूपत्ता बेचने की संभावना तलाश रहा है। mongabay.in की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था। इस रुझान पर प्रशासन की प्रतिक्रिया भी दर्ज है: downtoearth.org.in की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक वन अधिकारी ने संग्राहकों का तेंदूपत्ता जब्त कर लिया, जिसके विरोध में आदिवासियों ने उस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने की चेतावनी दी। यह घटना संग्राहकों और वन प्रशासन के बीच बढ़ते तनाव को उजागर करती है।

तेंदूपत्ता बीड़ी उद्योग के लिए कच्चे माल का प्रमुख स्रोत है और इसीलिए इसे छत्तीसगढ़ के जंगलों में 'हरा सोना' कहा जाता है। गबन के गंभीर आरोप, सरकारी दर पर संग्राहकों की असंतुष्टि और जब्ती की घटनाएँ मिलकर इस पूरी वितरण व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती हैं।