छत्तीसगढ़ में मानसूनी वर्षा की कमी से धान की बुआई एक सप्ताह पिछड़ी

छत्तीसगढ़ में मानसूनी वर्षा की गति धीमी रहने के चलते खरीफ मौसम में धान की बुआई का कार्य लगभग एक सप्ताह पिछड़ गया है। राज्य के अधिकांश अंचलों में जून के अंतिम सप्ताह तक बुआई का काम गति पकड़ लेता है। कई ज़िलों में सामान्य के मुकाबले 4545 से 8080 फीसदी तक कम वर्षा दर्ज की गई है। इस वजह से खेतों में जुताई और बीज डालने के लिए आवश्यक जलभराव नहीं हो सका है।
वर्षा की भारी कमी के कारण खेतों की मिट्टी में बुआई लायक नमी नहीं बन पाई है। जिन इलाकों में केवल हल्की फुहारें पड़ी हैं, वहां किसानों ने पहली जुताई करके खेत छोड़ दिए हैं। कृषक अब खेत की दोबारा जुताई यानी पलता करने और बुआई शुरू करने के लिए जोरदार बारिश की प्रतीक्षा कर रहे हैं। धान की रोपा और बोता दोनों ही विधियों में प्रारंभिक स्तर पर खेतों में पर्याप्त नमी और पानी का ठहराव अनिवार्य माना जाता है। सामान्यतः 2525 जून को ज्येष्ठ एकादशी के अवसर पर राज्य में खरीफ बुआई का पारंपरिक शुभारंभ होता है, मगर इस दफा किसान केवल प्रारंभिक तैयारियों तक सीमित हैं।
रायपुर स्थित कृषि महाविद्यालय के डीन डॉ. जी.के. दास ने बताया कि पिछले वर्ष की तुलना में खरीफ सत्र की शुरुआत धीमी रही है, किंतु किसानों को हड़बड़ी में बुआई करने से बचना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि खेत की केवल ऊपरी सतह को देखकर बीज डालना हानिकारक साबित हो सकता है। जब तक मिट्टी करीब 88 से 1010 इंच की गहराई तक पूरी तरह नम न हो जाए, तब तक बुआई रोकना ही श्रेयस्कर है। उनके अनुसार बतर बुआई सबसे सुरक्षित विकल्प है, ताकि अंकुरण प्रभावित न हो। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि कमजोर वर्षा के अंदेशे को देखते हुए कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों को तरजीह दी जाए।
विशेषज्ञों ने उपयुक्त परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में फसल विविधीकरण अपनाने का परामर्श दिया है। शासन की ओर से धान के स्थान पर दूसरी फसलें लेने वाले किसानों को प्रति एकड़ 1515 हजार रुपए तक की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। प्रदेश में धान की खेती के लिए मुख्य रूप से थरहा तैयार कर रोपाई, पारंपरिक बियासी, सीधी बुआई और छींटा पद्धति का इस्तेमाल किया जाता है।