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छत्तीसगढ़ में रूरल इंडस्ट्रियल पार्क योजना: वित्तीय प्रावधान और ज़मीनी संचालन की पड़ताल

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Ankur Panchbudhe from Pune, India / Wikimedia Commons, CC BY 2.0

छत्तीसगढ़ में ग्रामीण आजीविका संवर्धन के उद्देश्य से आरंभ की गई महात्मा गांधी रूरल इंडस्ट्रियल पार्क योजना वर्तमान में संचालन और वित्तीय निरंतरता के मोर्चे पर चुनौतियों का सामना कर रही है। पूर्ववर्ती शासन ने ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के साधन उपलब्ध कराने के लिए गौठानों को औद्योगिक केंद्रों में बदलने की शुरुआत की थी। इसके साथ ही नगरीय इलाकों के लिए अर्बन इंडस्ट्रियल पार्क की रूपरेखा भी तैयार की गई थी। हालांकि मैदानी स्तर पर फंड की कमी के कारण कई केंद्रों पर कामकाज प्रभावित हुआ है।

शासकीय रिकॉर्ड के मुताबिक इस योजना का नोडल विभाग पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग बनाया गया था। प्रथम चरण में राज्य भर के विभिन्न विकासखंडों में तीन सौ रूरल इंडस्ट्रियल पार्क विकसित करने के लिए राज्य बजट में छह सौ करोड़ रुपये का प्रावधान तय हुआ था। इस व्यवस्था में प्रत्येक विकासखंड के दो-दो गौठानों का चयन किया गया था। चयनित गौठानों में एक से तीन एकड़ भूमि आरक्षित कर शेड निर्माण, पहुंच मार्ग, पेयजल, विद्युत आपूर्ति और युवाओं के प्रशिक्षण के लिए प्रत्येक स्वीकृत पार्क को राशि देने की रूपरेखा थी। बालोद जिले के पांचों विकासखंडों में दस गौठान चयनित कर बीस करोड़ रुपये के विकास कार्यों का शिलान्यास किया गया था, जबकि मुंगेली जिले के छह गौठानों को भी आजीविका पार्क के रूप में शामिल किया गया था।

योजना के प्रारूप में सुराजी गांव योजना के तहत विकसित गौठानों में वर्मी कंपोस्ट उत्पादन, कुक्कुट पालन, बकरी पालन, कृषि व उद्यानिकी फसलों और लघु वनोपजों के प्रसंस्करण का लक्ष्य रखा गया था। इसके अतिरिक्त तेल मिल, दाल मिल और आटा चक्की जैसी इकाइयां स्थापित करने का प्रावधान था। नगरीय क्षेत्रों में स्वरोजगार को सहारा देने के लिए कोरबा नगर पालिक निगम के पंप हाउस वार्ड क्रमांक चौदह में लगभग दो करोड़ रुपये के प्रारंभिक बजट से अर्बन इंडस्ट्रियल पार्क का ढांचा बनाया गया था, जहां गोबर पेंट, प्लास्टिक रीसाइक्लिंग और पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर जैसी इकाइयां प्रस्तावित थीं।

स्थानीय स्तर पर निर्मित कई केंद्रों में आगे के विकास कार्यों के लिए राशि जारी न होने से गतिविधियां ठप पड़ गई हैं। कोरबा स्थित केंद्र में शेड और बाउंड्री वॉल जैसे निर्माण अधूरे पड़े हैं तथा गोबर पेंट उत्पादन से जुड़ी मशीनें जंग खा रही हैं। महिला स्व-सहायता समूहों और पूंजीविहीन युवाओं को आजीविका देने के दावों के बीच वर्तमान में यह महत्वाकांक्षी पहल प्रशासनिक समीक्षा और फंड के अभाव से जूझ रही है।

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