धमतरी जिला अस्पताल के चीरघर में कार्यरत मोहन वाल्मीकि की नियमितीकरण की मांग अधूरी

छत्तीसगढ़ के धमतरी स्थित जिला अस्पताल के चीरघर में कार्यरत स्वीपर मोहन वाल्मीकि लंबे समय से अपनी सेवा को नियमित करने की मांग कर रहे हैं। जीवनदीप समिति के अंतर्गत कलेक्टर दर पर कार्यरत इस कर्मी की यह मांग अब तक पूरी नहीं हो सकी है। इस संवेदनशील और कठिन ज़िम्मेदारी के बदले उन्हें प्रतिमाह केवल दस हज़ार रुपये का मानदेय प्रदान किया जाता है।
वर्तमान में 42 वर्ष के हो चुके मोहन वाल्मीकि अब तक हज़ारों पोस्टमार्टम कार्यों में सहयोग दे चुके हैं। उनके पिता भी इसी जिला चिकित्सालय में शव परीक्षण के काम में हाथ बंटाते थे। जब मोहन दसवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे, उस समय उनके पिता गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए। पारिवारिक आजीविका चलाने के उद्देश्य से उन्हें मात्र 16 वर्ष की उम्र में शव विच्छेदन के कार्य से जुड़ना पड़ा।
प्रारंभिक दौर में मृत शरीरों और रक्त को देखकर उनके हाथ थरथराते थे। शव परीक्षण के दृश्य लगातार स्मृति में बने रहने के कारण उन्होंने शुरुआत के एक वर्ष तक सब्ज़ी का सेवन पूरी तरह छोड़ दिया था। शव विच्छेदन की प्रक्रिया के दौरान उल्टी की समस्या से बचने के लिए उन्होंने दोपहर का खाना बंद कर दिया था। आगे चलकर यह आदत उन्होंने मृत देहों के प्रति सम्मान तथा अपने कार्य से जुड़ी संवेदनाओं के तहत स्थायी रूप से अपना ली। मोहन पिछले 10 वर्षों से दोपहर का भोजन नहीं करते हैं।
वे पूरे दिन सिर्फ चाय पीकर अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं और रात को लगभग ग्यारह बजे ही एक बार भोजन ग्रहण करते हैं। इसके अलावा उन्होंने कभी भी मदिरापान को हाथ नहीं लगाया है।
अस्पताल में शव विच्छेदन की व्यवस्था संभालने के बावजूद सीमित मानदेय मिलने और नियमितीकरण न होने के कारण मोहन वाल्मीकि का सेवा भविष्य अधर में लटका है। स्वास्थ्य सेवाओं में सहयोग देने वाले इस स्वीपर की नियमितीकरण की गुहार अब भी प्रशासनिक स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रही है।