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सरकारी स्कूलों में मंत्र और प्रार्थना की अनिवार्यता पर हाई कोर्ट का स्पष्टीकरण, बाध्य करने पर कार्रवाई की चेतावनी

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Domino786 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रदेश के शासकीय विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को हिंदू धार्मिक प्रार्थनाओं या मंत्रों के उच्चारण के लिए विवश नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने ‘अब्दुल सलाम रिजवी और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ प्रकरण की सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी।

स्कूल शिक्षा विभाग ने 12 जून को एक निर्देश जारी किया था। इसके अनुसार नए शैक्षणिक सत्र से सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों को संस्कृति से परिचित कराने के उद्देश्य से दिन में तीन समय प्रार्थना कराने की बात कही गई थी। इसमें सुबह की सभा में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, दीप मंत्र और गुरु मंत्र सहित छह प्रार्थनाएं, दोपहर भोजन के समय भोजन मंत्र तथा छुट्टी के वक्त शांति मंत्र का पाठ निर्धारित था।

इस व्यवस्था को असंवैधानिक बताते हुए छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा तथा सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद ने न्यायालय में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आमिर खान और सितारा खान ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि किसी विशिष्ट धर्म की उपासना पद्धति को अनिवार्य करना धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत और बच्चों के मौलिक अधिकारों पर आघात करता है। अधिवक्ताओं ने यह भी उठाया कि इस व्यवस्था में अनिच्छुक विद्यार्थियों के लिए किसी प्रकार की छूट अथवा पृथक रहने का प्रावधान नहीं है।

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अदालत को अवगत कराया गया कि यद्यपि यह आदेश जून में जारी हुआ था, परंतु विद्यालयों में इसे अभी लागू नहीं किया गया है। शासन के इस औपचारिक कथन को रिकॉर्ड पर लेते हुए पीठ ने याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी कि यदि आगे किसी भी विद्यार्थी पर इन प्रार्थनाओं या मंत्रों के लिए दबाव डाला जाता है, तो वे सीधे दोबारा न्यायालय आ सकते हैं। पीठ ने आगाह किया कि ऐसी स्थिति में उचित कार्रवाई की जाएगी।

इस प्रशासनिक निर्णय पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे हिंदुत्व राष्ट्रवाद का उदाहरण बताया और कहा कि यह भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतिकूल है।

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