छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी इंडस्ट्रियल पार्कों का विस्तार अटका, बजट रुकने से उपकरण हो रहे निष्प्रयोज्य

छत्तीसगढ़ में पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल के दौरान ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में आजीविका संवर्धन के मकसद से शुरू की गई महात्मा गांधी इंडस्ट्रियल पार्क परियोजना अब बजट की कमी का सामना कर रही है। कोरबा के वार्ड क्रमांक 14 पंप हाउस क्षेत्र में लगभग दो करोड़ रुपये के शुरुआती बजट से स्थापित महात्मा गांधी अर्बन इंडस्ट्रियल पार्क की संरचनाएं और उपकरण देखरेख के अभाव में प्रभावित हो रहे हैं।
स्थानीय अधिकारियों और प्रतिनिधियों से मिली जानकारी के मुताबिक आगे के निर्माण कार्यों के लिए शासन स्तर से राशि जारी नहीं की जा रही है। इस वजह से कई केंद्रों पर उत्पादन संबंधी गतिविधियां रुकी हुई हैं। कोरबा के इस पार्क में गोबर से पेंट निर्माण, प्लास्टिक दाना तैयार करने, टायर री-ट्रेडिंग, नमकीन फैक्ट्री, नारियल रेशे से रस्सी निर्माण और पैकेज्ड पेयजल जैसी सूक्ष्म इकाइयों की रूपरेखा बनी थी। तत्कालीन आयुक्त प्रभाकर पांडे के समय यहां शेड, चहारदीवारी और पहुंच मार्ग बने थे, मगर कई ढांचागत कार्य अभी अधूरे हैं।
उल्लेखनीय है कि राज्य शासन ने 2 अक्टूबर 2022 को महात्मा गांधी रूरल इंडस्ट्रियल पार्क योजना की औपचारिक शुरुआत की थी। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को इसका नोडल विभाग नियुक्त किया गया था। शासन के अनुसार पहले चरण में सभी विकासखंडों के दो-दो गौठानों में एक से तीन एकड़ भूमि सुरक्षित कर कुल 300 ग्रामीण पार्क बनाने की योजना थी। इसके लिए राज्य बजट में 600 करोड़ रुपये का प्रावधान रखकर प्रत्येक स्वीकृत पार्क को एक-एक करोड़ रुपये का आवंटन तय हुआ था।
इसी तरह बालोद ज़िले में पांचों विकासखंडों के दस चयनित गौठानों में कुल 20 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की मंजूरी दी गई थी। शासन का दावा था कि इन पार्कों के जरिए स्व-सहायता समूहों और ग्रामीण युवाओं को वर्मी कंपोस्ट, दाल मिल, तेल मिल और प्रसंस्करण जैसी इकाइयों से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाया जाएगा।
वर्तमान में कोरबा सहित विभिन्न जगहों पर गोबर पेंट के डंप पड़े रहने और अनुपयोगी पड़ी मशीनों में जंग लगने की शिकायतें सामने आ रही हैं। सरकारी स्तर से अगला बजट जारी न होने के कारण यह संशय बना हुआ है कि इन स्थापित परिसरों का आजीविका केंद्रों के तौर पर किस प्रकार उपयोग होगा।