छत्तीसगढ़ में मानसून की देर से दस्तक, 57 लाख हेक्टेयर खेती वाले राज्य में किसानों की निगाहें आसमान पर

लंबे इंतजार के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून आखिरकार छत्तीसगढ़ में दस्तक दे चुका है। इससे पहले के हफ्तों में राज्य के विभिन्न हिस्सों में जो छिटपुट बारिश हुई, वह स्थानीय मौसमी तंत्र के कारण थी — मानसूनी बादलों की सक्रियता से नहीं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मानसून के बादल देर तक आकाश में बने रहते हैं, जबकि स्थानीय तंत्र से बादल आते हैं और जल्दी छंट जाते हैं।
राज्य में 57 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर खेती होती है। पिछले साल धान का रकबा 35 लाख हेक्टेयर से अधिक रहा था, जिसमें से 27 लाख 61 हजार 871 हेक्टेयर का किसानों ने समितियों में पंजीयन कराया था — यानी वह फसल सरकारी खरीद केंद्रों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेची जानी थी। कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस बार खरीफ बोनी का रकबा और बढ़ सकता है, जिसमें धान की हिस्सेदारी बड़ी रहेगी।
मानसून से पहले हुई बेमौसम बारिश ने किसानों की परेशानी बढ़ाई है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. संकेत ठाकुर के अनुसार अप्रैल-मई में किसानों ने अकरस जुताई कराई थी, जिसका उद्देश्य खरपतवार को जड़ से नष्ट करना था। परंतु उसी अवधि में हुई बारिश से मिट्टी पूरी तरह नहीं सूख सकी और नमी बनी रह गई, जिससे खरपतवार पूरी तरह नहीं मरे। अब किसानों को अलग से खरपतवार नियंत्रण पर खर्च करना होगा, जिससे उनकी कुल उत्पादन लागत बढ़ेगी।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कमज़ोर मानसून की स्थिति पर अमर उजाला से कहा कि मौसम विभाग पहले ही इसका पूर्वानुमान दे चुका था। उन्होंने किसानों को मौसम के अनुरूप खेती अपनाने की सलाह दी और सरकार के किसानों के साथ खड़े रहने का दावा किया।
मौसम केंद्र रायपुर के आँकड़ों पर आधारित आज तक की रिपोर्ट के अनुसार रायपुर में अधिकतम तापमान 37 डिग्री और न्यूनतम तापमान 26 डिग्री के करीब रहने का अनुमान है। वायुमंडलीय दबाव 1002 के स्तर पर है और आर्द्रता 47 प्रतिशत दर्ज की गई है।
एक फसली क्षेत्रों में पूरे साल की उपज मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहती है। ऐसे में मानसून की अब हो रही सक्रियता किसानों के लिए राहत की बात है, लेकिन विशेषज्ञों की सलाह है कि बुवाई से पहले खेत में पर्याप्त नमी की जाँच अवश्य करें और खरपतवार प्रबंधन को नजरअंदाज न करें।