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छत्तीसगढ़ विधानसभा ने कर्मचारी चयन मंडल विधेयक 2026 सर्वसम्मति से पारित किया — 30 भर्ती परीक्षाएं अब पाँच श्रेणियों में होंगी एकीकृत

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Héctor Berganza / Pexels

छत्तीसगढ़ विधानसभा ने शुक्रवार को 'छत्तीसगढ़ कर्मचारी चयन मंडल विधेयक 2026' सर्वसम्मति से पारित किया। इस विधेयक के कानून बनने के बाद राज्य में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की सरकारी भर्तियों की परीक्षा संरचना मौलिक रूप से बदलेगी।

नैदुनिया और दैनिक भास्कर की रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में फिलहाल व्यापमं और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के जरिये करीब 30 प्रकार की भर्ती परीक्षाएं आयोजित होती हैं। इन्हें पाँच श्रेणियों में बाँटा जाएगा और समान शैक्षणिक पात्रता वाले पदों के लिए एकल संयुक्त परीक्षा होगी। उदाहरण के तौर पर, पीडब्ल्यूडी, जल संसाधन विभाग और नया रायपुर विकास प्राधिकरण — तीनों के लिए सब इंजीनियर की भर्ती हेतु पहले अलग-अलग परीक्षाएं कराई जाती थीं। नई व्यवस्था में जिन पदों की अर्हता स्नातक है उन सबके लिए एक परीक्षा होगी, जिन पदों के लिए बीटेक अनिवार्य है उनके लिए अलग एकल परीक्षा होगी।

शासन के अनुसार, नया छत्तीसगढ़ कर्मचारी चयन मंडल केंद्रीय कर्मचारी चयन आयोग यानी एसएससी की तर्ज पर कार्य करेगा। इसके दायरे में सभी सरकारी विभागों के साथ-साथ वैधानिक निकायों, मंडलों और प्राधिकरणों की तृतीय व चतुर्थ श्रेणी की भर्तियाँ आएंगी। मंडल की संरचना में एक अध्यक्ष, अधिकतम तीन सदस्य, एक सचिव और एक परीक्षा नियंत्रक होंगे। व्यापमं के मौजूदा अधिकारी और कर्मचारी भी इसी मंडल के अधीन काम करेंगे। भर्ती परीक्षाओं के अतिरिक्त यह मंडल विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षाएं भी आयोजित करेगा।

नैदुनिया की रिपोर्ट के अनुसार, विधानसभा में चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि मंडल गठन के बाद प्रतिवर्ष परीक्षा कैलेंडर जारी किया जाएगा, जिससे अभ्यर्थियों को तैयारी की स्पष्ट समय-सीमा मिलेगी। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकार पर भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के आरोप भी लगाए; इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री साय ने कुछ महीने पहले मंत्रालय में भर्ती परीक्षाओं की समीक्षा की थी, जिसमें यह तथ्य सामने आया कि एक जैसी पात्रता वाले पदों के लिए अलग-अलग परीक्षाएं होने से अभ्यर्थियों पर आर्थिक और मानसिक भार पड़ता है तथा सरकारी समय व संसाधन भी अधिक खर्च होते हैं। शासन के अनुसार, संयुक्त परीक्षा व्यवस्था से ये दोनों समस्याएं कम होंगी और भर्ती प्रक्रिया समयबद्ध रूप से पूरी हो सकेगी।