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बस्तर में धान रोपाई के बीच लोकगीतों और कहानी गीतों से श्रम की थकान घटा रहीं महिला किसान

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Nskjnv / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

बस्तर संभाग के कृषि क्षेत्रों में मानसूनी बारिश के चलते खेतों में जलभराव होने के बाद धान रोपाई का कार्य तेजी से चल रहा है। इस कृषि सत्र में स्थानीय आदिवासी महिलाएं खेतों में समूह बनाकर श्रम करते हुए पारंपरिक लोकगीतों और कहानियों का गायन कर रही हैं। यह वाचिक परंपरा कठिन शारीरिक श्रम के बीच न केवल उनका उत्साह बनाए रखती है, बल्कि कार्य के भारीपन को भी काफी हद तक कम करती है।

रोपाई के दौरान गाए जाने वाले इन गीतों की विषयवस्तु स्थानीय जनजीवन, प्रकृति और पारंपरिक किस्सों से जुड़ी होती है। खेतों में काम कर रहीं महिला किसानों का कहना है कि बचपन में जब वे अपनी नानी, दादी और गांव की बुजुर्ग महिलाओं के साथ खेतों में जाया करती थीं, तब उन्हें ये गीत और कहानियां सुनने को मिलती थीं। लंबे समय से निरंतर चली आ रही इस मौखिक परंपरा को वे अब अगली पीढ़ी के बच्चों और युवतियों तक पहुंचा रही हैं।

महिला किसानों के अनुसार पुराने दौर में जब मोबाइल फोन जैसे आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब ग्रामीण युवा आपसी संवाद और मनोरंजन के लिए इन गीतों का उपयोग करते थे। उस समय इन गीतों के माध्यम से आपस में प्रतिस्पर्धा भी की जाती थी। वर्तमान में भी रोपाई के दौरान ‘दाल खाई रे मारीला झिमटी पानी, आमी रानी तुमी राजा रे’ जैसे पारंपरिक लोक बोल खेतों में प्रमुखता से गाए जाते हैं।

बिना किसी औपचारिक अभ्यास के महिलाएं आपस में सुर और ताल मिलाकर इन लोकगीतों को गाती हैं। दिनभर झुककर की जाने वाली रोपाई की शारीरिक थकान को यह संगीत सहजता से दूर कर देता है। पूरे रोपाई सत्र के दौरान खेतों में यह सांस्कृतिक माहौल बना रहता है।

धान उत्पादक राज्य के रूप में पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ में कृषि कार्य और लोक संस्कृति का गहरा जुड़ाव रहा है। बस्तर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के साथ खेतों में श्रम करती हैं। इस पारंपरिक संगीत के माध्यम से रोपाई कार्य को उत्सव जैसा स्वरूप मिलता है और क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रूप से आगे बढ़ रही है।

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