गल्फ देशों में निर्यात ठप होने से छत्तीसगढ़ के तरबूज उत्पादकों को भारी घाटा

ईरान और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष की वजह से छत्तीसगढ़ के तरबूज उत्पादक किसानों को बड़े आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। गर्मियों के मौसम में खाड़ी देशों में तरबूज की भारी मांग रहती है, लेकिन मौजूदा युद्ध के कारण विदेशों में होने वाला निर्यात पूरी तरह बंद हो गया है। पहले राज्य का तरबूज मुंबई बंदरगाह के रास्ते गल्फ देशों में भेजा जाता था। बाहर भेजने के सभी रास्ते बंद होने के कारण किसानों को लगभग 300 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है।
थोक सब्जी मंडी के अध्यक्ष टी श्रीनिवास रेड्डी के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद से तरबूज का बाह्य प्रेषण रुक चुका है। इसके अतिरिक्त गुजरात, ओडिशा और उत्तर प्रदेश से भी राज्य में तरबूज की भारी आवक हो रही है। निर्यात ठप होने और बाहरी राज्यों से लगातार आपूर्ति आने के कारण स्थानीय बाजारों में फसल का भारी स्टॉक एकत्र हो गया है, जिसके चलते किसानों को अपनी उपज बेहद कम कीमतों पर बेचनी पड़ रही है।
मंडियों में तरबूज के दामों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। पूर्व में 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम बिकने वाला थोक भाव अब गिरकर 7 से 8 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया है। इसी तरह खुदरा बाजार में पहले तरबूज 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता था, जो अब घटकर 15 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गया है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के फल वैज्ञानिक डॉ. हेमंत पाणिग्रही के मुताबिक राज्य में तरबूज का उत्पादन फरवरी से शुरू होकर मई तक चलता है। प्रदेश के नदी तटीय इलाकों जैसे रायपुर, महासमुंद, गरियाबंद तथा रायगढ़ ज़िले के सारंगढ़ क्षेत्र में किसान मुख्य रूप से इसकी खेती करते हैं। इन क्षेत्रों में लगभग 12,000 एकड़ रकबे में तरबूज बोया जाता है और प्रति एकड़ औसतन 35 से 40 टन पैदावार होती है। किसान दिसंबर में बुआई शुरू करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह गतिरोध दो-तीन सप्ताह और बना रहा, तो किसानों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है।