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छत्तीसगढ़ में मानसूनी सुस्ती से धान की बुआई पिछड़ी, विशेषज्ञों ने कम अवधि की किस्मों की दी सलाह

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Jsuhzjakauajjaiqja / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

छत्तीसगढ़ में मानसूनी वर्षा की गति धीमी रहने के कारण चालू खरीफ सत्र की शुरुआत करीब एक सप्ताह पिछड़ गई है। राज्य के अधिकांश क्षेत्रों में जून के अंतिम सप्ताह तक धान की बुआई प्रारंभ हो जाती है। परंपरागत रूप से पच्चीस जून को ज्येष्ठ एकादशी के अवसर पर खरीफ कार्य का आरंभ माना जाता है, किंतु इस बार वर्षा के अभाव में अधिकांश कृषक केवल प्रारंभिक तैयारी ही कर सके हैं।

प्रदेश के अनेक ज़िलों में वर्षा का स्तर सामान्य से पैंतालीस से अस्सी प्रतिशत तक कम दर्ज किया गया है। खेतों में पर्याप्त नमी न होने से अधिकांश जगहों पर जुताई और बुआई का काम रुका हुआ है। जहाँ हल्की वर्षा हुई है, वहाँ किसानों ने केवल पहली जुताई की है। अब वे अच्छी मानसूनी वर्षा की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिसके बाद दोबारा जुताई यानी पलता करके बुआई की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

कृषि महाविद्यालय, रायपुर के डीन डॉ. जी.के. दास ने किसानों को जल्दबाज़ी में बुआई न करने का परामर्श दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सतह की नमी देखकर बीज नहीं बोना चाहिए। जब तक मिट्टी में आठ से दस इंच गहराई तक नमी न पहुँचे, तब तक बुआई टालना ही सुरक्षित है। उन्होंने बतर बुआई तकनीक अपनाने पर ज़ोर दिया, जिससे अंकुरण बेहतर रहे और दोबारा बुआई की नौबत न आए।

कमज़ोर मानसून की संभावना को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने कम अवधि में पकने वाली धान की प्रजातियों को लगाने की सलाह दी है, ताकि संभावित सूखे का जोखिम कम हो सके। इसके अतिरिक्त, अनुकूल परिस्थितियों में फसल विविधीकरण अपनाने का विकल्प भी दिया गया है। शासन द्वारा धान के स्थान पर अन्य वैकल्पिक फसलें लगाने पर कृषकों को प्रति एकड़ पंद्रह हज़ार रुपये तक की प्रोत्साहन सहायता प्रदान की जा रही है।

राज्य में धान की खेती मुख्य रूप से चार विधियों से होती है। इनमें थरहा तैयार कर रोपाई करना सबसे अधिक प्रचलित है, जिसके लिए पर्याप्त जलभराव चाहिए। इसके अलावा पारंपरिक बियासी पद्धति खरपतवार नियंत्रण में सहायक होती है। वहीं सीमित सिंचाई वाले इलाकों में सीधी बुआई का चलन बढ़ रहा है, जबकि छींटा अथवा प्रसारण पद्धति सबसे सरल और कम लागत वाली मानी जाती है।

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