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छत्तीसगढ़ में रबी मौसम: दलहन, तिलहन और बागवानी फसलों से घटाई जा रही भूजल पर निर्भरता

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: T. R. Shankar Raman / Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0)

छत्तीसगढ़ में खरीफ धान की कटाई पूरी होने के बाद रबी मौसम की फसलों की बुवाई शुरू हो गई है। राज्य में लगातार केवल धान उगाने के कारण भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है। इस समस्या से निपटने के लिए किसान अब कम पानी की खपत वाली फसलों जैसे गेहूं, चना, मसाला फसलों और बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सही मौसम और वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने पर उत्पादन और लाभ दोनों में बढ़ोतरी होती है।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. घनश्याम साहू के मुताबिक, राज्य में नवंबर से लेकर जनवरी तक का समय रबी फसलों की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त रहता है। उत्तर में अंबिकापुर के पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर दक्षिण में बस्तर तक किसान शीतकालीन चक्र में इन फसलों को अपना रहे हैं। बिलासपुर, अंबिकापुर और जांजगीर-चांपा जिलों में गेहूं की पैदावार प्रमुख रूप से की जाती है।

दलहनी फसलों की बात करें तो अविभाजित मध्य प्रदेश के समय से ही राजनांदगांव क्षेत्र चना और सोयाबीन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहा है। इसके साथ ही खैरागढ़, बेमेतरा, कवर्धा और मुंगेली जिलों में भी किसान बड़े स्तर पर चने की खेती करते हैं। धान के मुकाबले चने में जल की आवश्यकता बहुत कम होती है, जिससे किसानों को कम लागत में अच्छा विकल्प मिल जाता है।

राज्य के अलग-अलग हिस्सों में फल और सब्जियों की खेती का दायरा भी बढ़ रहा है। जशपुर जिले के अलावा अंबिकापुर के शंकरगढ़ विकासखंड और सूरजपुर में किसान स्ट्रॉबेरी की पैदावार कर रहे हैं। राजनांदगांव और दुर्ग जिले ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए मुफीद पाए गए हैं, जहां इसमें फूल और फल आने का चक्र देखा जाता है। इसके अतिरिक्त हरी सब्जियों में मटर की खेती अंबिकापुर, महासमुंद, बस्तर, नारायणपुर और बीजापुर जैसे जिलों में व्यापक रूप से हो रही है।

राज्य में उत्पादित हरी सब्जियों का निर्यात दूसरे प्रदेशों में भी किया जाता है। इसके अलावा फूलों की व्यावसायिक खेती को भी किसान अतिरिक्त आमदनी के स्रोत के रूप में अपना रहे हैं।

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