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छत्तीसगढ़: फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में बिना स्थगन वाले कर्मियों की बर्खास्तगी के निर्देश, विश्वविद्यालयों में भी जांच

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Domino786 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

छत्तीसगढ़ में अनुचित जाति प्रमाण पत्र के सहारे शासकीय पदों पर पदस्थ ऐसे सेवकों को सेवामुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई है, जिनके पास न्यायालय का कोई स्थगन आदेश नहीं है। सामान्य प्रशासन विभाग के दिशा-निर्देशों के तहत जिन मामलों में न्यायिक रोक लगी है, वहां उच्च न्यायालय में महाधिवक्ता कार्यालय के जरिए शीघ्र सुनवाई कराने का अनुरोध किया जा रहा है। साथ ही ऐसे कार्मिकों को महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वों से अलग रखने और विभागों में नियमित समीक्षा करने को कहा गया है।

सामान्य प्रशासन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2000 से 2020 तक उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण एवं छानबीन समिति रायपुर के पास 758 शिकायतें दर्ज हुईं। समिति ने 659 प्रकरणों की जांच पूरी कर 267 मामलों में जाति प्रमाण पत्र अमान्य अथवा फर्जी पाए। रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 75 मामले बीते दो वर्षों के दौरान सामने आए थे। अधिकांश प्रकरण अदालतों में लंबित होने अथवा स्थगन आदेश मिलने के कारण कार्मिक अब भी सेवा में बने हुए हैं।

शासन के कड़े रुख के बाद शिक्षण संस्थानों में भी दस्तावेजों के सत्यापन का काम शुरू हुआ है। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के कुलसचिव डॉ. गिरीशकांत पाण्डेय द्वारा बायोटेक्नोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. एसके जाधव, अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. आर के ब्रम्हें, भौतिकी विभाग की प्रोफेसर डॉ. नमिता ब्रम्हे और इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर सुशील इंदुलकर सहित 30 से अधिक प्राध्यापकों एवं कर्मियों को नोटिस देकर सत्यापित प्रमाण पत्र मांगे गए हैं।

सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक बीपीएस नेताम तथा पूर्व सांसद सोहन पोटाई ने इस विषय पर लगातार कदम उठाने की मांग की थी। सामाजिक प्रतिनिधियों का कहना है कि फर्जी दस्तावेजों के चलते मूल आरक्षित वर्ग के अधिकारों की उपेक्षा हो रही है। मरवाही उपचुनाव के दौरान अमित जोगी और ऋचा जोगी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त होने के उपरांत इस विषय पर प्रशासनिक छानबीन की मांग और तेज़ हुई थी।

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