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कवर्धा के बाद बस्तर संभाग में दिव्यांगजनों और आईईडी पीड़ितों के लिए लगेंगे विशेष शिविर, मिलेंगे नि:शुल्क उपकरण

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Subhashish Panigrahi / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

कवर्धा में दिव्यांगजनों के लिए आयोजित उपकरण वितरण शिविर के पश्चात अब बस्तर संभाग में बारूदी सुरंग विस्फोटों के प्रभावितों और दिव्यांग नागरिकों के लिए विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं। कवर्धा में सेवाएँ देने वाला विशेषज्ञ दल ही आगे जगदलपुर और दंतेवाड़ा पहुँचेगा। इन शिविरों के माध्यम से ज़रूरतमंद हितग्राहियों को कृत्रिम अंग, जयपुर फुट, ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर, बैसाखी, श्रवण यंत्र और कैलिपर्स नि:शुल्क वितरित किए जा रहे हैं। शासन का कहना है कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य नक्सली हिंसा तथा अन्य कारणों से शारीरिक क्षति झेल चुके लोगों को पुनर्वास सहायता प्रदान करना है।

उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, कवर्धा में 23 से 26 सितंबर तक आयोजित तीन दिवसीय शिविर का शुभारंभ किया गया था, जहाँ पहले ही दिन लगभग बारह सौ लोगों ने अपना पंजीयन कराया था। कवर्धा के इस सफल आयोजन के बाद वही तकनीकी दल 5 से 7 अक्टूबर 2026 तक जगदलपुर में शिविर संचालित करेगा। जगदलपुर केंद्र में बस्तर, कोंडागांव, कांकेर और नारायणपुर ज़िलों के पात्र व्यक्तियों को शामिल किया जाएगा। इसके उपरांत 15, 16 और 17 अक्टूबर को दंतेवाड़ा में अगला शिविर आयोजित होगा, जिसमें दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर ज़िलों के हितग्राही लाभान्वित होंगे। उपमुख्यमंत्री ने बताया कि जगदलपुर आयोजन के लिए पूर्व स्तर पर ही लगभग तीन हज़ार लोगों का पंजीकरण प्राप्त हो चुका था।

प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार ग्राम सभाओं के माध्यम से ज़मीनी स्तर पर पात्र और ज़रूरतमंद ग्रामीणों को चिह्नित किया गया है। इन शिविरों के लिए राजस्थान के जयपुर से अनुभवी चिकित्सकों और तकनीकी विशेषज्ञों की विशेष टीम पहुँची है। तकनीकी विशेषज्ञ डॉक्टर अतुल जैन के अनुसार, कटे हुए हाथ-पैर वाले प्रभावित व्यक्तियों का नाप लेकर मौके पर ही कृत्रिम अंग तैयार किए जा रहे हैं।

जिन लाभार्थियों के लिए कृत्रिम अंग संभव नहीं हैं, उन्हें आवागमन के लिए ट्राइसाइकिल या व्हीलचेयर उपलब्ध कराई जा रही है। इसके अतिरिक्त श्रवण बाधितों को श्रवण यंत्र और पोलियो से ग्रसित व्यक्तियों को कैलिपर्स दिए जा रहे हैं। उपमुख्यमंत्री के अनुसार, बस्तर के जंगलों में बिछाई गई आईईडी की चपेट में आकर कई ग्रामीणों ने अपने अंग गँवाए हैं, और यह प्रयास उनके कष्टों को कम करने के लिए किया गया है।

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