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मध्य प्रदेश में कमजोर मानसून से 19 प्रतिशत कम वर्षा, सोयाबीन और धान की फसलों पर संकट

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Bishnu Sarangi / Wikimedia Commons (CC0)

मध्य प्रदेश में मौजूदा मानसून सत्र के दौरान बादलों की सुस्ती ने खरीफ फसलों के उत्पादन पर संकट खड़ा कर दिया है। राज्य में 5 अगस्त तक सामान्य औसत के मुकाबले 19 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। बारिश में आई इस भारी कमी के कारण सोयाबीन, धान और मक्का की खेती करने वाले किसानों की चिंताएं बढ़ गई हैं। कृषि विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि यदि आने वाले समय में पर्याप्त पानी नहीं बरसा, तो फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।

मौसम संबंधी आंकड़ों के अनुसार 5 अगस्त तक पूरे प्रदेश में कुल 16.27 इंच वर्षा दर्ज की गई, जो निर्धारित सामान्य औसत से काफी पीछे है। इंदौर जिले में इस अवधि के दौरान महज 15.44 इंच पानी बरसा, जो वहां के सामान्य स्तर से 5.06 इंच कम है। खेतों में जरूरी नमी न होने की वजह से कई क्षेत्रों में पौधों की सामान्य बढ़वार धीमी पड़ गई है।

क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो पूर्वी मध्य प्रदेश सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है। जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभागों में सामान्य से लगभग 20 प्रतिशत तक कम वर्षा हुई है। इन संभागों के विभिन्न जिलों में बारिश का घाटा 1 प्रतिशत से लेकर 42 प्रतिशत तक पहुंच गया है। पश्चिमी हिस्से के भोपाल, इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम और ग्वालियर-चंबल संभागों में भी औसतन 11 प्रतिशत कम बादल बरसे हैं।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सोयाबीन की फसल इस समय अत्यंत संवेदनशील स्थिति में है। खेतों में पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर फूल और फलियां समय से पहले झड़ने का गंभीर जोखिम बन गया है। धान की फसल में कल्ले फूटने यानी टिलरिंग की प्रक्रिया धीमी पड़ रही है, जिससे प्रति पौधा बालियों की संख्या घट सकती है। यदि अगस्त माह में स्थिति नहीं सुधरी, तो फसलों की गुणवत्ता और कुल पैदावार दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक यदि राज्य में वर्षा का घाटा 20 प्रतिशत के पार जाता है, तो मध्य प्रदेश को सामान्य से कम वर्षा वाली श्रेणी में डाल दिया जाएगा। हालांकि मौसम विभाग ने 6 अगस्त से सक्रिय होने वाले पश्चिमी विक्षोभ के असर से कई जिलों में भारी बारिश की संभावना जताई है, जिससे जलसंकट और खेती को कुछ राहत मिल सकती है।

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