मुख्यमंत्री वृक्षारोपण प्रोत्साहन योजना: धान के बदले पेड़ लगाने और पंचायतों को पौधारोपण पर प्रोत्साहन राशि का प्रावधान

छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार द्वारा संचालित मुख्यमंत्री वृक्षारोपण प्रोत्साहन योजना के माध्यम से काश्तकारों को खेतों में पेड़ लगाने पर वित्तीय सहायता दी जाती है। रायपुर में आयोजित एक आभासी कार्यक्रम के दौरान शुरू की गई इस योजना को प्रदेश की राजीव गांधी किसान न्याय योजना के साथ सम्बद्ध किया गया था। शासकीय प्रावधानों के अनुसार खरीफ वर्ष 2020 में धान की खेती करने वाले जिन कृषकों ने अपने खेतों में धान के स्थान पर वृक्षारोपण किया है, उन्हें आगामी तीन वर्षों तक 10 हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराई जाती है।
योजना के दिशा-निर्देशों के तहत यह आर्थिक सहायता पंचायतों और समितियों पर भी समान रूप से लागू होती है। ग्राम पंचायतें यदि अपने पास उपलब्ध बजट से वृक्षारोपण का कार्य संपन्न कराती हैं, तो एक वर्ष की अवधि पूर्ण होने के पश्चात उन्हें भी 10 हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है। शासन का मानना है कि इस व्यवस्था से पंचायतों की आय में वृद्धि होगी। इसी तर्ज पर संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ यदि अपने पास उपलब्ध कोष का उपयोग कर शासकीय राजस्व भूमि पर व्यावसायिक उद्देश्य से पौधे लगाती हैं, तो उन्हें भी प्रति एकड़ 10 हजार रुपये मिलने का प्रावधान है।
पेड़ों के पातन और क्रय-विक्रय से जुड़े नियमों में भी लचीलापन प्रदान किया गया है। सरकारी जानकारी के अनुसार अपने निजी खेतों में रोपे गए वृक्षों की कटाई के लिए किसानों को भविष्य में किसी भी शासकीय अथवा वन विभाग की पूर्व स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं होगी। इसके साथ ही व्यावसायिक प्रयोजन के लिए पौधारोपण करने वाली संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को वृक्षों के पातन और उनके बाजार में विक्रय का पूर्ण अधिकार दिया गया है। योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वन विभाग द्वारा 99 लाख से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया था, जबकि आम नागरिकों को वितरण हेतु 2 करोड़ 27 लाख पौधे उपलब्ध कराए गए।
प्रशासनिक दावों के मुताबिक इमारती और व्यावसायिक महत्व की लकड़ियों के रोपण से किसानों को आय का नया माध्यम मिलेगा, जिससे ग्रामीण अर्थशास्त्र सुदृढ़ होगा। शासन के अनुसार फलदार पेड़ लगने से ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को घर पर ही पौष्टिक फल उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे बाल कुपोषण की दर में गिरावट आने की संभावना व्यक्त की गई है। अधिकारियों का दावा है कि इस पहल से प्राकृतिक पर्यावरण में संतुलन स्थापित होगा और ग्रामीण अंचल में हरियाली का प्रसार होने के साथ-साथ कृषक परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी।