सामुदायिक वन अधिकार: नोडल एजेंसी को लेकर विवाद, आदेश निरस्त करने की माँग

छत्तीसगढ़ में सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के क्रियान्वयन और प्रबंधन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर विवाद गहरा गया है। वन विभाग द्वारा स्वयं को इस प्रक्रिया का नोडल विभाग तय किए जाने के आदेश के खिलाफ आदिवासी संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। संगठनों ने इस व्यवस्था को नियमविरुद्ध बताते हुए मुख्यमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप की माँग की है।
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के अनुसार, वनाधिकार मान्यता कानून के तहत सामुदायिक अधिकारों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी कानूनी रूप से आदिवासी विकास विभाग और केंद्रीय आदिवासी कार्य मंत्रालय की है। संगठन का आरोप है कि वन विभाग ने पंद्रह मई दो हज़ार पच्चीस को परिपत्र जारी कर इस कानूनी अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। संगठन का कहना है कि यह नया आदेश पूर्व में अट्ठाईस मई दो हज़ार बीस के उस सरकारी निर्णय पर आधारित है, जिसे जनविरोध के चलते पहले ही वापस लिया जा चुका था।
आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के टीएन गोदावर्मन वाद और नेशनल वर्किंग प्लान कोड दो हज़ार तेईस का हवाला देकर केवल वर्किंग प्लान आधारित वैज्ञानिक प्रबंधन को मान्य बताया गया है। इसके जरिए ग्राम सभाओं और उनकी सामुदायिक वन प्रबंधन समितियों द्वारा बनाई गई योजनाओं के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की बात कही गई है। आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि यह कदम कानून की मूल भावना और समुदाय आधारित वन प्रशासन व्यवस्था के विपरीत है।
एक तरफ धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के अंतर्गत ग्राम सभाओं को वन संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन के लिए पंद्रह लाख रुपये देने की योजना पर कार्य हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ वन विभाग पर एकाधिकार बढ़ाने के आरोप लग रहे हैं।
इधर जनसंपर्क विभाग के अनुसार, रायपुर में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्राप्त ग्राम सभाओं के आजीविका संवर्धन के लिए दो दिवसीय कार्यशाला भी आयोजित की गई। बहरहाल, आंदोलनकारी संगठनों ने माँग रखी है कि शासन इस विवादित आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द करे। साथ ही ग्राम सभाओं द्वारा तैयार प्रबंधन योजनाओं को मान्यता देते हुए आदिवासी विकास विभाग को ही नोडल एजेंसी बनाए रखने का लिखित आश्वासन जारी किया जाए।