छत्तीसगढ़ में रबी मौसम के दौरान गेहूं, दलहन और बागवानी फसलों की खेती पर विशेषज्ञों का जोर

छत्तीसगढ़ में धान कटाई के बाद नवंबर से जनवरी तक का समय रबी फसलों की बुवाई के लिए सबसे मुफीद माना जाता है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. घनश्याम साहू के अनुसार, राज्य में लगातार धान की खेती से गिरते भूजल स्तर की समस्या को देखते हुए किसान अब गेहूं, दलहन और मसाला फसलों को विकल्प के रूप में अपना रहे हैं।
डॉ. साहू ने बताया कि अंबिकापुर के पहाड़ी इलाकों से लेकर बस्तर तक किसान शीतकाल में प्रमुखता से गेहूं और चना की बुवाई करते हैं। रबी मौसम में बिलासपुर, अंबिकापुर तथा जांजगीर-चांपा में गेहूं का रकबा अधिक रहता है। वहीं चना उत्पादन में राजनांदगांव, खैरागढ़, बेमेतरा, कवर्धा और मुंगेली जिलों की भागीदारी प्रमुख है। राजनांदगांव का क्षेत्र अविभाजित मध्य प्रदेश के समय से ही चना और सोयाबीन उत्पादन के लिए पहचाना जाता रहा है।
पारंपरिक अनाजों के साथ ही प्रदेश में गैर-पारंपरिक और बागवानी फसलों का चलन भी तेजी से बढ़ा है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में फूलों की खेती के अलावा जशपुर, अंबिकापुर के शंकरगढ़ ब्लॉक और सूरजपुर में किसान स्ट्रॉबेरी की पैदावार ले रहे हैं। इसके साथ ही ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने दुर्ग और राजनांदगांव जिलों को अनुकूल बताया है, जहां वर्तमान में पौधों में फूल और फल आने का समय रहता है।
सब्जियों के उत्पादन में भी प्रदेश का दायरा विस्तृत हुआ है। अंबिकापुर, महासमुंद, बस्तर, नारायणपुर और बीजापुर जैसे जिलों में किसान बड़े पैमाने पर हरे मटर की फसल ले रहे हैं। प्रदेश से हरी सब्जियों का निर्यात दूसरे राज्यों में निरंतर किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि वैज्ञानिक तकनीकों के प्रयोग से खेती की लागत कम होती है और किसानों को मिलने वाले मुनाफे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है।