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छत्तीसगढ़ में धान का रकबा तीन लाख हेक्टेयर घटाने की तैयारी, मोटे अनाजों को बढ़ावा

प्रतीकात्मक तस्वीर · फ़ोटो: Propriyam! / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

छत्तीसगढ़ शासन ने असिंचित और पहाड़ी क्षेत्रों में धान का रकबा तीन लाख हेक्टेयर घटाकर कोदो-कुटकी, रागी, मक्का, उड़द और मूंगफली जैसी फसलों को बढ़ावा देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान विभाग ने राज्य की जलवायु, मिट्टी के प्रकार और उत्पादन लागत का अध्ययन कर एक रिपोर्ट शासन को सौंपी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, असिंचित और पथरीली जमीनों पर धान की तुलना में मोटे अनाजों और तिलहन की खेती किसानों के लिए अधिक लाभकारी है।

अनुसंधान रिपोर्ट के मुताबिक, धान की फसल से किसानों को प्रति हेक्टेयर करीब 25 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा होता है। इसके विपरीत, रागी की खेती से प्रति हेक्टेयर लगभग 47 हजार रुपये तक का लाभ मिल सकता है। राज्य में फिलहाल कोदो-कुटकी और रागी की खेती लगभग 80 हजार हेक्टेयर में हो रही है, जिससे सालाना करीब 500 करोड़ रुपये का कारोबार होता है। शासन का लक्ष्य इन फसलों का रकबा बढ़ाकर दो लाख हेक्टेयर करने का है। इस विस्तार से इन पौष्टिक अनाजों का वार्षिक कारोबार बढ़कर 1500 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

कृषि वैज्ञानिकों ने अध्ययन के लिए पूरे राज्य को तीन प्रमुख कृषि जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया है। इनमें बस्तर का पठार, छत्तीसगढ़ का मैदानी इलाका और उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि विभिन्न क्षेत्रों की जमीन की संरचना अलग-अलग है। बस्तर के पठारी इलाके में उच्च भूमि को मरहान व टिकरा, मध्यम को माल और निचली भूमि को गभार कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र में उच्च भूमि भाटा, मध्यम मटासी और निचली भूमि डोरसा व कन्हार के रूप में वर्गीकृत है। इसी तरह उत्तरी पहाड़ी हिस्से में डांड उच्च भूमि, गोडा व चवर मध्यम और बहरा निचली जमीन कहलाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पथरीली या मुरम मिश्रित उच्च भूमियों में पानी की कम खपत वाली फसलें आसानी से तैयार हो जाती हैं। बाजार में लो-कैलोरी और पोषक तत्वों से भरपूर अनाजों की मांग तेजी से बढ़ी है। शासन का उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार की जरूरतों से जोड़कर किसानों की आय में वृद्धि करना है।

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